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समस्तीपुर में “दोगुना रोजगार-दोगुनी आय” मिशन को मिली नई गति, उच्च स्तरीय समिति ने सराहा कृषि मॉडल

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समस्तीपुर जिले में “दोगुना रोजगार-दोगुनी आय” मिशन के तहत उच्च स्तरीय समिति ने कृषि, उद्यानिकी और डेयरी गतिविधियों का निरीक्षण किया। समिति ने किसानों की आय बढ़ाने वाले मॉडलों को सराहा।

समस्तीपुर/आलम की खबर:समस्तीपुर जिले में कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने की कोशिशें अब राज्य स्तर पर भी चर्चा का विषय बनने लगी हैं। “दोगुना रोजगार-दोगुनी आय” मिशन के तहत गठित उच्च स्तरीय समिति के दो दिवसीय दौरे ने जिले में चल रहे कृषि, उद्यानिकी और डेयरी मॉडल को नई पहचान दिलाई है। समिति ने विभिन्न क्षेत्रों का दौरा कर खेती से जुड़े आधुनिक प्रयोगों, ग्रामीण रोजगार के नए अवसरों और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में हो रहे प्रयासों का विस्तृत अध्ययन किया।

इस दौरे का उद्देश्य सिर्फ योजनाओं की समीक्षा करना नहीं था, बल्कि यह समझना भी था कि किस प्रकार आधुनिक तकनीक और स्थानीय संसाधनों के सहारे गांवों की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाया जा सकता है। समिति के अध्यक्ष एवं सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी नवीन कुमार तथा अर्थशास्त्री प्रोफेसर टी.सी. अनंत ने जिले के कई इलाकों का दौरा कर जमीनी स्तर पर चल रहे कार्यों का निरीक्षण किया।

दौरे के पहले दिन समिति हसनपुर प्रखंड के नयानगर क्षेत्र पहुंची। यहां प्रगतिशील किसान सुधांशु सिंह द्वारा विकसित आधुनिक कृषि मॉडल ने समिति का ध्यान आकर्षित किया। खेतों में उन्नत तकनीक से तैयार किए गए फल बागानों और आधुनिक खेती पद्धति को देखकर समिति के सदस्य काफी प्रभावित नजर आए। अधिकारियों ने खेतों में लगे केला, अमरूद, आम, नींबू, लीची और जामुन के बागानों का निरीक्षण किया और खेती में इस्तेमाल हो रही तकनीकों की जानकारी ली।

किसानों ने समिति को बताया कि आधुनिक तकनीक अपनाने से उत्पादन क्षमता में बढ़ोतरी हुई है और लागत भी पहले की तुलना में नियंत्रित हुई है। ड्रिप सिंचाई, जैविक खाद और वैज्ञानिक पद्धति से खेती करने के कारण फसलों की गुणवत्ता में सुधार हुआ है, जिसका सीधा फायदा बाजार में बेहतर कीमत के रूप में मिल रहा है। समिति ने माना कि यदि इस मॉडल को बड़े स्तर पर लागू किया जाए तो ग्रामीण इलाकों में रोजगार और आय दोनों में बड़ा बदलाव संभव है।

समिति ने खेतों में बनाए गए प्रदर्शन प्लॉट का भी अवलोकन किया। यहां अलग-अलग फसलों की उन्नत प्रजातियों पर प्रयोग किए जा रहे थे। अधिकारियों ने कहा कि खेती को अब पारंपरिक तरीके से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता, बल्कि तकनीक और वैज्ञानिक अनुसंधान को खेतों तक पहुंचाना समय की जरूरत है।

दौरे के दौरान समिति ने केला पकाने वाली इकाई का भी निरीक्षण किया। यहां फलों को वैज्ञानिक तरीके से सुरक्षित रखने और बाजार तक पहुंचाने की प्रक्रिया दिखाई गई। अधिकारियों ने माना कि प्रसंस्करण और भंडारण की बेहतर व्यवस्था होने से किसानों को बड़ा लाभ मिल सकता है। इससे एक ओर जहां फसल की बर्बादी कम होगी, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।

इसके बाद समिति मिथिला मिल्क डेयरी पहुंची, जहां डेयरी प्रबंधन और दुग्ध उत्पादन की गतिविधियों की जानकारी ली गई। समिति ने डेयरी क्षेत्र को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बताते हुए कहा कि खेती के साथ पशुपालन को जोड़ना किसानों की स्थायी आय सुनिश्चित करने का प्रभावी तरीका है। डेयरी से जुड़ी महिलाओं और पशुपालकों ने समिति को बताया कि इस क्षेत्र से जुड़ने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है।

विशेष रूप से जीविका समूहों और पशु सखी मॉडल की भूमिका को समिति ने सराहा। अधिकारियों का कहना था कि गांवों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी आत्मनिर्भरता की दिशा में सकारात्मक संकेत है। महिलाओं के आर्थिक रूप से मजबूत होने से ग्रामीण समाज में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहे हैं।

समिति ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा में वैज्ञानिकों और अधिकारियों के साथ विस्तृत बैठक भी की। बैठक में कृषि आधारित रोजगार, आधुनिक खेती, जैविक कृषि, ग्रामीण उद्योग और युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ने जैसे विषयों पर चर्चा हुई। कृषि वैज्ञानिकों ने समिति के सामने कई नई तकनीकों और अनुसंधान आधारित योजनाओं की जानकारी प्रस्तुत की।

बैठक में यह बात प्रमुखता से सामने आई कि बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य में खेती को केवल परंपरागत पेशा मानकर नहीं चलाया जा सकता। खेती को उद्योग और उद्यमिता से जोड़ना जरूरी है। समिति ने सुझाव दिया कि किसानों को बाजार, प्रसंस्करण और तकनीकी सुविधाओं से जोड़ने पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।

समिति ने कृषि सखी, पशु सखी और जीविका समूहों की सक्रिय भूमिका की भी प्रशंसा की। अधिकारियों ने कहा कि ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं और गांवों में आत्मनिर्भरता की नई मिसाल बन रही है।

पूसा कृषि विश्वविद्यालय परिसर के भ्रमण के दौरान समिति ने अनुसंधान केंद्रों और प्रशिक्षण गतिविधियों की जानकारी ली। अधिकारियों ने कहा कि यदि अनुसंधान और तकनीक का सीधा लाभ किसानों तक पहुंचे तो खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाया जा सकता है।

इस पूरे कार्यक्रम में जिला प्रशासन की भूमिका भी अहम रही। जिला अधिकारी रोशन कुशवाहा, जिला कृषि पदाधिकारी डॉ. सुमित कुमार, जिला परियोजना प्रबंधक विक्रांत शंकर सिंह और अन्य अधिकारियों ने कार्यक्रम के संचालन और समन्वय में सक्रिय भूमिका निभाई।

दौरे के अंत में समिति ने कहा कि समस्तीपुर जिले में कृषि, उद्यानिकी, डेयरी और ग्रामीण आजीविका के क्षेत्र में हो रहे प्रयास अन्य जिलों के लिए भी प्रेरणादायक हैं। समिति का मानना है कि यदि इसी तरह तकनीक, प्रशिक्षण और बाजार व्यवस्था को गांवों से जोड़ा जाए तो “दोगुना रोजगार-दोगुनी आय” का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

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